सच क्या है ब्रिटेन में सैन्य अड्डे पर हमले के नाम पर ईरान को घसीटने की इस नई कहानी का

सच क्या है ब्रिटेन में सैन्य अड्डे पर हमले के नाम पर ईरान को घसीटने की इस नई कहानी का

जब भी पश्चिम में सुरक्षा एजेंसियों को अपनी मुस्तैदी दिखानी होती है, तब भू-राजनीतिक ड्रामे की एक नई स्क्रिप्ट तैयार कर ली जाती है। ब्रिटेन की काउंटर-टेररिज्म पुलिस ने हाल ही में पांच ब्रिटिश नागरिकों को गिरफ्तार किया है[cite: 1]। उनकी उम्र महज बीस से पच्चीस साल के बीच बताई जा रही है[cite: 1]। शक यह जताया गया कि ये सभी रॉयल एयरफोर्स के फेयरफोर्ड एयरबेस को निशाना बनाने की किसी बड़ी साजिश में शामिल थे[cite: 1]। इस एयरबेस का इस्तेमाल अमेरिकी सेना भी करती है[cite: 1]। बस फिर क्या था, पश्चिमी मीडिया ने बिना एक सेकंड गंवाए इसका सीधा नाता तेहरान और ईरान से जोड़ना शुरू कर दिया[cite: 1]।

लेकिन इस बार तेहरान ने चुपचाप बैठने से इनकार कर दिया है। ब्रिटेन में स्थित ईरानी दूतावास ने बेहद कड़े शब्दों में इन तमाम अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है[cite: 1]। दूतावास ने साफ कहा है कि ब्रिटिश मीडिया और कुछ स्थानीय धड़े बिना किसी ठोस सबूत के ईरान पर बेबुनियाद आरोप मढ़ रहे हैं[cite: 1]। यह पूरी कहानी को गढ़ने जैसा है, जिसका हकीकत से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है[cite: 1]।

जब अटकलों को ही मान लिया जाए सच

मीडिया का एक वर्ग अक्सर ऐसी सनसनीखेज खबरें तलाशता रहता है जिससे टीआरपी मिल सके। फेयरफोर्ड एयरबेस की सुरक्षा से जुड़ी इस गिरफ्तारी के बाद भी कुछ ऐसा ही हुआ[cite: 1]। पुलिस ने अभी तक पकड़े गए युवकों के नाम या उनकी मंशा से जुड़े पुख्ता दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए हैं[cite: 1]। इसके बावजूद, तमाम विशेषज्ञ रातों-रात रणनीतिक विश्लेषक बनकर यह बहस चलाने लगे कि इसके पीछे ईरान का हाथ हो सकता है[cite: 1]।

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यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ एक अनुमान के आधार पर किसी देश को अंतरराष्ट्रीय साजिश का मास्टरमाइंड घोषित करना सही है? ईरान के दूतावास ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि कैसे बिना किसी आधिकारिक पुलिस बयान के ईरान का नाम घसीटा जा रहा है[cite: 1]।

तेहरान की दो टूक चेतावनी

ईरानी अधिकारियों ने इस मामले में सिर्फ खंडन तक खुद को सीमित नहीं रखा है[cite: 1]। उन्होंने सीधी चेतावनी दी है कि इस तरह का निराधार दुष्प्रचार दोनों देशों के बीच पहले से ही तनावपूर्ण चल रहे कूटनीतिक रिश्तों को और अधिक नुकसान पहुंचा सकता है[cite: 1]। दूतावास ने यह भी संकेत दिया है कि यदि मीडिया बिना तथ्यों की पुष्टि के ऐसी झूठी कहानियां प्रकाशित करना जारी रखता है, तो वे कानूनी विकल्पों पर विचार करने से पीछे नहीं हटेंगे[cite: 1]।

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कूटनीति की दुनिया में अफवाहें कई बार बड़े संकटों की वजह बन जाती हैं। जब तक ब्रिटिश सरकार या पुलिस की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आता, तब तक इस तरह के दावों को सिर्फ एक अटकलबाजी ही माना जाना चाहिए[cite: 1]। पश्चिमी सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठते रहे हैं कि कैसे छोटे मामलों को बढ़ा-चढ़ाकर एक बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाता है[cite: 1]।

भविष्य में इस तरह के मामलों की तह तक जाना जरूरी है ताकि यह साफ हो सके कि सुरक्षा के नाम पर जनता को भ्रमित तो नहीं किया जा रहा है[cite: 1]। सच और प्रोपेगैंडा के बीच की इस धुंध को हटाने के लिए केवल ठोस सबूतों पर ही भरोसा किया जाना चाहिए[cite: 1]।

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Zoe Roberts

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