लेबनान सीजफायर के बाद भी इजरायल क्यों नहीं छोड़ेगा दक्षिणी इलाका

लेबनान सीजफायर के बाद भी इजरायल क्यों नहीं छोड़ेगा दक्षिणी इलाका

मिडिल ईस्ट में शांति की बातें सिर्फ कागजों पर अच्छी लगती हैं। जमीन की हकीकत हमेशा अलग होती है। अभी हाल ही में हुए लेबनान सीजफायर को लेकर पूरी दुनिया राहत की सांस ले ही रही थी कि इजरायल ने साफ कर दिया कि वह इतनी आसानी से घुटने टेकने या पीछे हटने वाला नहीं है। इजरायल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने सीधे शब्दों में एक नई रेड लाइन खींच दी है। उन्होंने साफ कहा कि भले ही लेबनान में युद्धविराम की बातें चल रही हों, लेकिन इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान में बनाए गए अपने 'सुरक्षा क्षेत्र' से एक इंच भी पीछे नहीं हटने वाली।

यह बयान उस समय आया है जब अमेरिका, ईरान और कतर जैसे देश परदे के पीछे से इस युद्ध को रोकने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। लोगों को लग रहा था कि समझौता होते ही इजरायली टैंक वापस लौट जाएंगे। लेकिन इजरायल का इरादा कुछ और ही है। वे अपने नागरिकों की सुरक्षा के नाम पर उस इलाके पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं।

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क्या है गिदोन सार की नई रेड लाइन

इजरायली विदेश मंत्री गिदोन सार ने न्यूजीलैंड के अपने समकक्ष विंस्टन पीटर्स से फोन पर बातचीत के दौरान पूरी स्थिति को साफ किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर भी लिखा कि इजरायल का लेबनान की जमीन पर कब्जा करने का कोई इरादा नहीं है। कोई क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा नहीं है। लेकिन वे दक्षिणी लेबनान के सुरक्षा क्षेत्र को खाली भी नहीं करेंगे। अगर वे वहां से हटे, तो उनके नागरिकों पर हिजबुल्लाह के हमलों और घुसपैठ का खतरा फिर से बढ़ जाएगा।

सार का तर्क सीधा है। लेबनान की संप्रभुता पिछले कई दशकों से खत्म हो चुकी है। वहां ईरान का परोक्ष कब्जा है जो हिजबुल्लाह के जरिए काम करता है। इजरायल और लेबनान दोनों के हित में यही है कि हिजबुल्लाह के इस आतंकी ढांचे को पूरी तरह खत्म किया जाए। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक इजरायली सेना वहीं डटी रहेगी।

प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी इस बात को दोहराया है। उन्होंने साफ कहा कि सेना तब तक दक्षिणी लेबनान में रहेगी जब तक वहां से खतरा पूरी तरह टल नहीं जाता। इजरायल का कहना है कि उनकी लड़ाई लेबनान के आम लोगों से नहीं बल्कि हिजबुल्लाह से है।


सुरक्षा क्षेत्र की जमीनी हकीकत

यह सुरक्षा क्षेत्र बेसिकली सीमा से लगभग 6 मील यानी करीब 10 किलोमीटर अंदर तक का इलाका है। हालिया हिंसक झड़पों के बाद इजरायली सेना ने इस पूरे इलाके को अपने नियंत्रण में ले लिया है। कफ्र तेबनित और अली ताहेर जैसी रणनीतिक पहाड़ियों पर अब इजरायल का कब्जा है। ये वो इलाके हैं जहां से पूरे दक्षिणी लेबनान पर नजर रखी जा सकती है।

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युद्धविराम के बीच भी तनाव कम नहीं हुआ है। इजरायली सेना को साफ निर्देश दिए गए हैं कि वे खुद से कोई हमला नहीं करेंगे। लेकिन अगर हिजबुल्लाह की तरफ से कोई भी हरकत होती है, तो उन्हें तुरंत और कड़ा जवाब देने की पूरी आजादी है।

सैनिकों को साफ कहा गया है कि वे बिना वजह आम नागरिकों पर गोलियां न चलाएं। लेकिन अगर कोई उनके सुरक्षा घेरे के बहुत करीब आता है, तो वे कार्रवाई कर सकते हैं। इसके अलावा बिना सीनियर अफसरों की मर्जी के वहां के घरों या बुनियादी ढांचे को नष्ट करने पर भी रोक लगाई गई है। यानी सेना पूरी तरह से डिफेंसिव मोड में है, लेकिन सतर्कता में कोई कमी नहीं है।


पर्दे के पीछे चल रही कूटनीति

इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब पाकिस्तान और कतर ने अमेरिका-ईरान वार्ताओं के बीच एक 'डीकॉन्फ्लिक्शन सेल' बनाने का एलान किया। इसका मकसद यह देखना है कि लेबनान में सैन्य अभियानों पर पूरी तरह रोक लगी रहे। इस सेल में ईरान, अमेरिका और लेबनान के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

एक तरफ स्विट्जरलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन को लेकर तकनीकी बातचीत चल रही है, तो दूसरी तरफ इजरायल अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है। नेतन्याहू ने तो यहां तक दावा कर दिया है कि अमेरिकी मदद से इजरायल ने इतिहास का सबसे बड़ा हवाई हमला करके ईरान के परमाणु बुनियादी ढांचे को तबाह कर दिया है। उनका कहना है कि जब तक वे सत्ता में हैं, ईरान को कभी परमाणु हथियार नहीं बनाने देंगे।


इस रेड लाइन का आगे क्या असर होगा

इजरायल का यह सख्त रुख दिखाता है कि लेबनान सीजफायर सिर्फ एक अस्थाई विराम हो सकता है, स्थाई शांति नहीं। जब तक हिजबुल्लाह को पूरी तरह से निरस्त्र नहीं किया जाता या वह इस इलाके से पीछे नहीं हटता, तब तक युद्ध की चिंगारी कभी भी दोबारा भड़क सकती है।

तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, लेकिन जमीन पर मौजूद सेनाएं एक-दूसरे पर नजरें गड़ाए बैठी हैं। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह सीजफायर कितना टिक पाता है।

अब देखना होगा कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच इजरायल इस सुरक्षा क्षेत्र को कब तक अपने पास रख पाता है और हिजबुल्लाह की अगली रणनीति क्या होती है।

ZR

Zoe Roberts

Zoe Roberts excels at making complicated information accessible, turning dense research into clear narratives that engage diverse audiences.