ईरान और अमेरिका में शांति समझौता होने के बाद भी स्विट्ज़रलैंड में मीटिंग क्यों हो रही है

ईरान और अमेरिका में शांति समझौता होने के बाद भी स्विट्ज़रलैंड में मीटिंग क्यों हो रही है

जब बुधवार को अमेरिका और ईरान ने अपने ऐतिहासिक 14-पॉइंट शांति समझौते पर डिजिटल हस्ताक्षर कर दिए, तो दुनिया ने राहत की सांस ली। लेकिन तुरंत ही एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया। अगर समझौता पहले ही हो चुका है, तो शुक्रवार को स्विट्ज़रलैंड के बर्गनस्टॉक रिजॉर्ट में होने वाली हाई-लेवल मीटिंग का क्या मतलब है? क्या यह सिर्फ एक दिखावा है या इसके पीछे कोई गहरा कूटनीतिक प्लान है?

स्विस सरकार ने साफ कर दिया है कि मीटिंग रद्द नहीं हुई है। प्लान के मुताबिक दोनों देश और उनके मध्यस्थ वहां मिल रहे हैं। लोग सोच रहे हैं कि जब कागज पर दस्तखत हो चुके हैं, तो इस बैठक की जरूरत क्यों पड़ी। इसका सीधा जवाब यह है कि असली और पेचीदा काम अब शुरू होने जा रहा है। डिजिटल दस्तखत तो सिर्फ शुरुआत थी।

शहबाज शरीफ का दावा और पाकिस्तान की किरकिरी

इस मीटिंग को लेकर भ्रम तब फैला जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया पर जल्दबाजी में एक बड़ा दावा कर दिया। उन्होंने कह दिया कि 19 जून को स्विट्ज़रलैंड में अमेरिका और ईरान के बीच एक भव्य हस्ताक्षर समारोह होने जा रहा है जिसकी मेजबानी पाकिस्तान करेगा। इस घोषणा के तुरंत बाद ईरान के विदेश मंत्रालय ने इसका खंडन कर दिया।

ईरान ने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के राष्ट्रपतियों ने इस समझौते पर पहले ही डिजिटल रूप से दस्तखत कर दिए हैं। स्विट्ज़रलैंड में ऐसा कोई औपचारिक समारोह नहीं होने वाला है। इसके बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को अपनी पोस्ट डिलीट करनी पड़ी, जिससे राजनयिक स्तर पर उनकी काफी फजीहत हुई। लेकिन इस भ्रम ने लोगों के मन में यह आशंका पैदा कर दी कि क्या स्विस मीटिंग भी ठंडे बस्ते में चली गई है।

बर्गनस्टॉक रिजॉर्ट में आखिर क्या होने वाला है

स्विट्ज़रलैंड के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को बयान जारी कर पूरी स्थिति साफ की। स्विस सरकार के मुताबिक यह बैठक एक औपचारिक समारोह नहीं बल्कि क्रियान्वयन यानी इंप्लीमेंटेशन की शुरुआत है। शुक्रवार से दोनों पक्षों के बीच तकनीकी बातचीत का पहला दौर शुरू होगा।

इस बातचीत में अमेरिका और ईरान के साथ मध्यस्थ देश पाकिस्तान और कतर भी शामिल होंगे। यह 60 दिनों की एक तय समय सीमा की शुरुआत है। इस दौरान दोनों देशों को जमीन पर उन वादों को पूरा करना होगा जो उन्होंने समझौते में किए हैं।

पहाड़ों के ऊपर कूटनीति की सुरक्षित बिसात

इस बार बातचीत के लिए स्विट्ज़रलैंड ने अपनी वादियों के बीच बर्गनस्टॉक रिजॉर्ट को चुना है। यह कोई आम जगह नहीं है। ल्यूसर्न झील के पास एक पहाड़ी के ऊपर बसा यह रिजॉर्ट सुरक्षा के लिहाज से अभेद्य है।

साल 2013 में जब ईरान परमाणु समझौते को लेकर जेनेवा के इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में बातचीत चल रही थी, तब मीडिया के सैकड़ों कैमरों और पत्रकारों ने पूरी प्रक्रिया को घेर रखा था। कूटनीतिज्ञों के लिए बिना किसी दबाव के खुलकर बात करना मुश्किल हो रहा था। बर्गनस्टॉक रिजॉर्ट का सबसे बड़ा फायदा यही है कि यह पहाड़ी पर होने के कारण यहां तक पहुंच को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। स्विस सेना और पुलिस ने पूरे इलाके को छावनी में बदल दिया है ताकि मीडिया की नजरों से दूर गंभीर मुद्दों पर काम हो सके।

इन बड़े मुद्दों पर अगले 60 दिनों में होगी माथापच्ची

समझौते की रूपरेखा तय हो चुकी है, लेकिन उसके तकनीकी पहलुओं को सुलझाना बेहद जटिल है। आने वाले दो महीनों में इसी रिजॉर्ट में कई बड़े फैसलों पर मोहर लगनी है।

सबसे पहला और जरूरी काम होर्मुज जलडमरूमध्य यानी Strait of Hormuz को दोबारा पूरी तरह खोलना है। ईरान ने दो महीने से इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते को बंद कर रखा था और वहां समुद्री बारूदी सुरंगें बिछाई हुई थीं। समझौते के तहत अगले 30 दिनों में ईरान को इन बारूदी सुरंगों को हटाना होगा। अमेरिकी नौसेना अपनी नाकाबंदी हटा रही है, जिसके शुरुआती संकेत दिखने भी लगे हैं और बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही शुरू हो गई है।

दूसरा सबसे संवेदनशील मुद्दा ईरान के परमाणु कार्यक्रम का है। ईरान के पास 9000 किलोग्राम से अधिक समृद्ध यूरेनियम का स्टॉक है। इसमें से करीब 440 किलोग्राम यूरेनियम हथियारों के ग्रेड के बेहद करीब है। अब स्विट्ज़रलैंड की टेक्निकल मीटिंग में यह तय होगा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA की निगरानी में इस यूरेनियम को कैसे और कितनी जल्दी नष्ट या कमजोर किया जाएगा।

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प्रतिबंधों में ढील और तेल की बिक्री का अगला कदम

अमेरिका ने ईरान को इस 60 दिनों के युद्धविराम के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल बेचने की अस्थाई छूट दे दी है। इससे दुनिया भर में चल रहा ऊर्जा संकट थोड़ा कम जरूर होगा। लेकिन ईरान की विदेशों में फ्रीज पड़ी संपत्तियों को कब और कैसे अनलॉक किया जाएगा, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि बर्गनस्टॉक में हो रही कूटनीतिक बातचीत कितनी सफल रहती है।

यह कोई आसान बातचीत नहीं है। लेबनान से इजरायली सेना की वापसी और क्षेत्र में पूरी तरह से शांति बहाली जैसे मुद्दे भी इस कूटनीतिक टेबल पर मौजूद हैं। ईरान के संसदीय पैनल के प्रमुख इब्राहिम अजीजी ने पहले ही साफ कर दिया है कि अगर अमेरिका ने समझौते की किसी भी शर्त का उल्लंघन किया, तो इसका करारा जवाब दिया जाएगा।

शुक्रवार से शुरू होने वाली यह स्विस कूटनीति दुनिया को एक बड़े युद्ध से बचाने का आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण मौका है। कागजी काम खत्म हो चुका है, अब परीक्षा जमीन पर वादे निभाने की है।

ZR

Zoe Roberts

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